बुनकर महिलाओं की बदलती सामाजिक-आर्थिक स्थितिःएक समाजशास्त्री विश्लेषण
नेहा इरशाद खान1*, निरूपमा सिंह2
1शोधछात्रा, समाजशास्त्र विभाग, लखनऊ विश्वविद्यालय, लखनऊ, उत्तर-प्रदेश, भारत ।
2डी0 ए0 वी 0 डिग्री कॉलेज, समाजशास्त्र विभाग, लखनऊ, उत्तर-प्रदेश, भारत ।
*Corresponding Author E-mail: nehabhu201617@gmail.com
ABSTRACT:
भारत के पारंपरिक हस्तशिल्प कला और कपड़ा उद्योग में बुनकर समुदाय की महिलाओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। विशेष रूप से मुस्लिम तथा अन्य परंपरागत बुनकर परिवारों में महिलाओं की भागीदारी घरेलू आर्थिक और सामाजिक-सांस्कृतिक विभिन्न स्तरों पर दिखाई पड़ती है। वैश्वीकरण, तकनीकी उद्विकास, बाजार संरचना में परिवर्तन और सरकारी योजनाओं के प्रभाव स्वरूप बुनकर महिलाओं की सामाजिकऔर आर्थिक स्थिति में विशिष्ट परिवर्तन किया गया है। यह शोध पत्र बुनकर महिलाओं की वर्तमान स्थिति चुनौतियों और उभरते अवसरों का विश्लेषण है।भारत का हथकरघा क्षेत्र सांस्कृतिक विरासत का खजाना है, जो सदियों पुरानी पारंपरिक शिल्प कला और बुनाई तकनीक का प्रतिनिधित्व करता है। हाथ से बने हुए वस्त्र केवल कपड़े ही नहीं वह दृ कहानीकार हैं जो विभिन्न क्षेत्रों के इतिहास, संस्कृति और कलात्मकता को एक साथ पिरोते हैं। हर वस्तु चाहे वह जीवंत बनारसी साड़ी हो या जटिल कांजीवरम रेशम हो या मिट्टी की पशमीना शॉल हो भारत के विविध समुदायों और परंपराओं का सार समेटे हुए हैं। हालांकि अपने सांस्कृतिक महत्व के अलावा भारतीय हथकरघा देश के आर्थिक ढांचे में खासकर ग्रामीण इलाकों में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं ।हथकरघा उद्योग भारत में रोजगार का दूसरा सबसे बड़ा स्रोत है जो लाखों बुनकरों का कारीगरों को आजीविका प्रदान करता है। जिसमें से अधिकांश महिलाएं हैं। यह क्षेत्र ग्रामीण रोजगार को बढ़ावा देता है और पीढ़ीयो से चले आ रहे पारंपरिक ज्ञान को जीवित रखना है।
KEYWORDS: बुनकर महिला, हथकरघा उद्योग, वस्त्र उद्योग, सामाजिक-आर्थिक स्थिति, आर्थिक समस्या, रोजगार।
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भारतीय समाज में सामाजिक-आर्थिक इतिहास में महिला बुनकरों का स्थान अत्यधिक महत्वपूर्ण रहा है। वस्त्र निर्माण की परंपरा भारत की सांस्कृतिक धरोहर का मुख्य हिस्सा रहा है और इनमें महिलाओं की भागीदारी प्राचीन काल से लेकर वर्तमान दौर तक निरंतर दिखाई देती है। वस्त्र केवल रोजमर्रा के जीवन की आवश्यकता की पूर्ति का साधन नहीं रहे, बल्कि वे सामाजिक प्रतिष्ठा, सांस्कृतिक चिन्ह और राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के आधार स्तंभ भी है। इस दृष्टि से महिला बुनकरों का ऐतिहासिक स्वरूप बाल श्रम तक सीमित न होकर सामाजिक सांस्कृतिक चेतन से भी जुड़ी है।
प्राचीन भारत में स्त्रियां सूत काटने और बुनाई कार्य में कुशल मानी जाती थी। वैदिक साहित्य में सूतकाता और वस्त्रनिर्माण जैसे शब्दों का उल्लेख मिलता है जो या प्रमाणित करता है कि यह कार्य महिलाओं की प्रमुख जिम्मेदारी थी (शर्मा,2005)। सिंधु घाटी सभ्यता की खुदाई से मिले टकली और करके के अवशेष भैया दर्शाते हैं कि वस्त्र निर्माण एक संगठित घरेलू उद्योग था, जहां महिलाओं का श्रम मुख्य भूमिका निभाता था (ठाकुर, 2012)। इस काल में महिला बुनकरों का स्वरूप मुख्ता गृह उद्योग और पारिवारिक सहयोग तक सीमित था किंतु या कला और कौशल का द्योतक भी था।
मध्यकाल में भारतीय वस्त्र उद्योग ने नई ऊंचाइयां प्राप्त की बनारसी जामदानी मलमल और डेक्कनी रेशम जैसी विभिन्न वस्त्र परंपराएं इसी काल में प्रतिष्ठित हुई यद्यपि बड़े कार्गो पर कार्य करने का दायित्व प्रायः पुरुषों का माना जाता था तथापि महिलाएं धागा काटने, सूक्ष्म कढ़ाई, सजावट और वस्त्रो के अंतिम रूप देने जैसे कार्यों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती थी (निजामी, 1998)। इस प्रकार उनके श्रम अदृश्य होते हुए भी भारतीय वस्त्र परंपरा के संरक्षण और संवर्धन में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका रखता है इस काल में महिला बुनकरों का स्वरूप सांस्कृतिक धरोहर के संवाहक के रूप में स्थापित हुआ।
औपनिवेशिक काल महिला बुनकरों के लिए चुनौती पूर्ण रहा ब्रिटिश औद्योगिक नीतियों और मशीन निर्मित कपड़ों के आयात में भारतीय करघा उद्योग को गंभीर संकट में डाल दिया पुरुष बुनकरों की तरह ही महिला बुनकरों की जीविका पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ा तथापि इसी काल में महात्मा गांधी द्वारा चलाए गए चरखा आंदोलन और स्वदेशी आंदोलन ने महिला बुनकरों के स्वरूप को एक नया आयाम प्रदान किया चरखा महिलाओं के हाथों में न केवल आर्थिक आत्मनिर्भरता का साधन बना, बल्कि या राष्ट्रीय आंदोलन और आत्मसम्मान का प्रतीक भी बन गया (चक्रवर्ती, 1984)। बुनकरों का स्वरूप केवल घरेलू आर्थिक भूमिकाओं तक सीमित न रहकर स्वतंत्रता संघर्ष से भी गहराई से जुड़ा है।
स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात महिला बुनकरों का स्वरूप संस्थागत और संगठित रूप में विकसित हुआ। सरकार द्वारा हथकरघा विकास कार्यक्रम, सरकारी समितियां और स्वयं सहायता समूह की स्थापना से महिलाओं को उत्पादन और विपणन की नई संभावनाएं बनाई गई है। ग्रामीण क्षेत्रों में महिला बुनकरों ने बुनाई को केवल पारंपरिक कार्य न मानकर इसे आजीविका और सामाजिक सशक्तिकरण का साधन बनाया (कुमार, 1995)। इस प्रकार स्वतंत्रता उपरांत महिला बुनकरों का स्वरूप आर्थिक आत्मनिर्भरता और सामाजिक सम्मान से संबंधित हैं।
वर्तमान युग में महिला बुनकरों का स्वरूप और भी बहुआयामी हो गया है। आज महिलाएं पारंपरिक बुनाई से आगे बढ़कर आधुनिक डिजाइन, फैशन उद्योग और अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी सक्रिय रूप से जुड़ी है। स्वयंसेवी संगठन और सरकारी योजनाओं ने उन्हें वित्तीय सहायता, प्रशिक्षण और वैश्विक मंच प्रदान किया है। अब महिला बुनकर केवल पारंपरिक कारीगर ही नहीं रही बल्कि वह उद्यमिता नवाचार और सांस्कृतिक दूत की भूमिका भी निभा रही है। यह स्वरूप उन्हें सामाजिक आर्थिक जीवन में व्यापक परिवर्तन और आत्मनिर्भरता का द्योतक है।
भारत की बुनाई एक दीर्घकालिक परंपरा है जो पीडियों से चली आ रही है। यह देश अपनी जटिल बुनाई और शानदार वस्त्र उत्पादन के लिए जाना जाता है। भारत में बुनाई का पहला प्रमाण सिंधु घाटी सभ्यता से मिलता है जो 3300-1300 ईसा पूर्व तक विद्यमान थी। बुनाई का मुख्य उद्देश्य रोजमर्रा के जीवन में इस्तेमाल होने वाले वस्त्र और कपड़ा बनाना था। हालांकि समय के साथ बुनाई को एक कला के रूप में देखा जाने लगा है।
भारतीय परंपरा और संस्कृति मुख्ता वस्त्र उद्योग विशेष रूप से प्राचीन काल से लेकर वर्तमान तक हथकरघा वस्त्र उद्योग में निहित है। हथकरघा बुनाई क्षेत्र में आय और आजीविका के सबसे बड़े असंगठित क्षेत्र में से एक हैया महत्वपूर्ण है की बुनकरों में अधिकांश महिलाएं हैं और वह आर्थिक और सामाजिक रूप से पिछड़े हैं हथकरघा वस्त्र बुनाई क्षेत्र वस्त्र के निर्यात में पर्याप्त मात्रा में योगदान देता है और घरेलू देश को विदेशी मुद्रा भंडार प्राप्त करता है। यह निर्यात आय का पन्द्रह प्रतिशत प्राप्त होता है। ग्रामीण हथकरघा बुनाई क्षेत्र देश की हथकरघा बुनाई वस्तुओं की कुल मांग का पन्द्रह प्रतिशत उत्पादन प्राप्त कर रहा है। हथकरघा क्षेत्र ग्रामीण और अर्ध शहरी क्षेत्र में विशेष रूप से कई विकासशील देशों में अच्छी स्थिति में था। भारतीय बुनाई पद्धतियां अत्यंत अनूठी है। और पारंपरिक मूल्यों के साथ मिश्रित है क्योंकि हथकरघा उत्पादन विशेष रूप से साड़ियां भारत में सभी समुदायों के विशेष अवसरों पर उपयोग की जाती है। कुशल बुनकरों की नवीनता और कड़ी मेहनत से निर्मित उत्पादों की सुंदरता देखते ही बनती है इन हथकरघा उत्पाद के लाभ स्थायित्व, डिजाइन में विशेषता और गुणवत्ता है ।इसलिए यह लोगों को हथकरघा उत्पादन विशेष रूप से साड़ियां खरीदने की खुशी और रुचि देता है या क्षेत्र ग्रामीण क्षेत्र से 14 प्रतिशत औद्योगिक उत्पादन और सकल घरेलू उत्पादन में दो प्रतिशत का उपयोग देता है ।भारतीय हथकरघा क्षेत्र भारत के अग्रणी ग्रामीण कुटीर उद्योग है और इसमें कृषि के बाद प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से 13 मिलियन बुनकरों को रोजगार देने की सबसे बड़ी क्षमता है। हथकरघा क्षेत्र ग्रामीण गरीबों ,ग्रामीण महिलाओं अशिक्षित बेरोजगार को रोजगार देता है । लेकिन फिर भी हथकरघा बुनकरों की आर्थिक और सामाजिक स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ है। ग्रामीण क्षेत्रों में हथकरघा बुनकरों को कम मजदूरी दी जाती है। कोई सामाजिक सुरक्षा उपाय उपलब्ध नहीं है ।काम करने की स्थिति खराब है व्यवसाय के कारण स्वास्थ्य की स्थिति कमजोर है, रहने की स्थिति भी खराब है और औपचारिक कर्ज की अनुपलब्धता है ।वर्तमान विश्लेषण ने इन पंक्तियों में अध्ययन करने का प्रस्ताव दिया ताकि नीति निर्माता को विकास प्रक्रिया में उन्हें शामिल करने के लिए सुझाव प्रदान किया जा सके।
चौथी अखिल भारतीय हथकरघा जनगणना 2019-20 के अनुसार देश में 25 प्रतिशत हथकरघा बुनकर महिला है। आज भारत में महिला बुनकरों की संख्या 58 मिलियन से अधिक है। अधिकांश भारत में हथकरघा बुनकरों के पारंपरिक तालिमो से संबंधित है, और जब से यह युवा थे, तब से वह बुनाई से पहले के अधिकांश काम संभालते रहे हैं जैसे कि सूत और कपड़े को बांधना और रंगना और अलंकरण कपड़ों पर हाथ से कढ़ाई करके। भले ही महिलाएं बुनाई नहीं कर रही हों , फिर भी वह संबंध कार्यबल का हिस्सा होती है क्योंकि इसमें पूरा परिवार शामिल होता है। हथकरघा के लिए तीन संबंध मुख्य बुनकर उसे श्रमिकों की आवश्यकता होती है, और वह अनिवार्य रूप से एक ही परिवार से होंगे, जिसमें महिलाएं भी शामिल होती हैं। भारत में लोग परंपरागत रूप से बुनाई कर रहे हैं लेकिन लोगों की सामाजिक- आर्थिक स्थिति में आधुनिकीकरण की आश्चर्य जनक रूप से महिलाओं को और भी अधिक हासिए की ओर धकेल रहा है। जिसकी वजह से अर्ध कुशल बुनकरों को बेरोजगारी एवं आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ रहा है तथा इन लोगों में अशिक्षा एवं कौशल का अभाव होने के कारण इनका अन्य रोजगारों की ओर अग्रसर होना पड़ रहा है ।जिसके साथ ही साथ उनका नए-नए रोजगारों में अत्यधिक समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है।
तनुश्री 2015 के अनुसार अध्ययन में पाया कि वाराणसी के हथकरघा बुनकरों ने अपना प्रतिष्ठित पारंपरिक उद्योग खो दिया है तथा या पूरे भारत में केवल औद्योगीकरण के कारण घटित हुआ है पूंजीवादी उत्पादन पावर लूम का हस्तक्षेप कच्चे माल की बढ़ती कीमत कम मजदूरी एवं श्रम की समस्या ने हथकरघा उद्योग को बंद करने की तरफ धकेल दिया है इसके अतिरिक्त उत्पादन प्रणाली ज्यादातर एक विशेष उद्यमी वर्ग गद्दीदार या मास्टर बुनकरों के नियंत्रण में है। ऐतिहासिक रूप से महिला बुनकर हथकरघा बुनाई प्रथाओं का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रही है, लेकिन इस योगदान पर ध्यान नहीं दिया जाता है क्योंकि बुनाई अधिकांश कारीगरों के लिए एक घरेलू गतिविधि है जो अपने घरों में रहते हैं और बुनाई करते हैं, इसके साथ-साथ हैंडकॉम क्षेत्र का आधुनिकीकरण भी हुआ है।
डोडमनी, श्रीनिवास (2015) के अनुसार अध्ययन में बताया कि यादमीर जिले के हथकरघा बुनकरों जिसको या व्यवसाय विरासत के रूप में मिला है, उसकी स्थिति अत्यंत ही दयनीय है। इनमें से अधिकतर बुनकर श्रमिक बुनकर हैं जो दिन में 10 घंटे से ज्यादा काम करने के बावजूद न्यूनतम मजदूरी प्राप्त करते हैं।
बेगम, रुखसाना और डे सीमा (2020) के अनुसार झारखंड केऔर सामाजिक आधार पर बुनकरों की कलाओं और स्थितियों का वर्णन किया गया है तथा इस कार्य में लगे सभी जातियां को भी बताया है जिनका अपने-अपने स्थान पर मुख्य भूमिका रही है।
प्रसाद, अनिल कुमार और अवस्थी चंद्रकांत (2023) के अनुसार अध्ययन में बताया है कि बिहार छपरा प्रमंडल के कई हुनरमंद बुनकर कारीगर पुरस्कृत भी हुई लेकिन मशीनीकरण के दौर में पर्याप्त पूंजी एवं सरकारी सहायता के अभाव में पारंपरिक कुटीर उद्योग पड़ गया है इसमें बुनकरों के सामाजिक आर्थिक स्थितियों का दिन प्रतिदिन बिगड़ा स्वरूप का वर्णन है।
निष्कर्ष:
महिला बुनकरों का ऐतिहासिक स्वरूप निरंतर परिवर्तनशील रहा है। प्राचीन काल में यह घरेलू और पारिवारिक कल के रूप में तथा मध्यकाल में सांस्कृतिक धरोहर के संवर्धन के रूप में और औपनिवेशिक काल में राष्ट्रीय चेतना और आत्मनिर्भरता के प्रतीक के रूप में तथा स्वतंत्रता के बाद आजीविका और सामाजिक प्रतिष्ठा के साधन के रूप में और समकालीन दौर में उद्योग और वैश्विक पहचान के रूप में निखर के सामने आई है। इस प्रकार महिला बुनकरों की भूमिका केवल वस्त्र निर्माण में सहभागी भूमिका निभाती चली आई है।जिसके कारण भारतीय समाज और संस्कृति तथा आर्थिक दूरी भी दृष्टिगोचर होती है।
बुनकर महिलाओं की सामाजिक आर्थिक स्थिति में पिछले एक दशक में उल्लेखनीय परिवर्तन हुआ है। वे अब केवल पारिवारिक श्रमिक के स्थान पर उत्पादक, डिजाइनर, कारीगर और उद्यमी के रूप में नजर आ रही है। फिर भी शिक्षा, बाजार पहुंच, तकनीकी कौशल और आर्थिक स्वतंत्रता जैसे क्षेत्रों में अभी भी सुधार की आवश्यकता है। जिसके फलस्वरुप उचित नीतिगत समर्थन प्रशिक्षण और सामाजिक संवेदनशीलता से इन मुख्य क्षेत्र में परिवर्तन और सुदृढ़ किया जा सकता है। जिसके साथ ही साथ महिला सशक्तिकरण का भी स्वरूप स्पष्ट रूप से देखने को मिलता है। तत्पश्चात स्वतंत्र भारत की आधी आबादी जिसे महिला कहते हैं,उनमें भी आत्मनिर्भरता जैसी स्थिति परिलक्षित हो सकेगी तथा वर्तमान में महिलाओं की आर्थिक और सामाजिक स्थितियों में मुख्य परिवर्तन दृष्टिगत होगा। हुनरमंद बुनकर महिलों को आपनी योगयत के आधार पर कई पुरस्कार भी मिले है लेकिन मशीनीकरण के कारण पूंजी एवं सरकारी सहायता के अभाव मे पारंपरिक कुटीर उद्योग ठप पड़ गया है । इससे सीधे -सीधे जुड़े बुनकर बेरोजगार हो गये है । इनका कहना है की अगर इनके संरक्षण एवं संवर्धन की उचित व्यवस्था होतो यह उद्योग एक बार फिर से जीवित हो सकता है । इससे रोजगार के अवसर भी होंगे ।
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Received on 28.11.2025 Revised on 26.12.2025 Accepted on 19.01.2026 Published on 17.03.2026 Available online from March 20, 2026 Int. J. Ad. Social Sciences. 2026; 14(1):45-48. DOI: 10.52711/2454-2679.2026.00011 ©A and V Publications All right reserved
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